Saturday, 2 January 2016

मेरी कलम


                         मेरी कलम 

में हाथ में कलम  उठाये बेहटा हु,
कि गलतियां मैंने जहा , उस बात पे सर जुखाये बेहटा हु,
ढूंढ़ता जहा सच हर कदम पे ,वही  झूट सुलगाएँ सेहता  हु,
पाया दर्द जहा मैंने वहाँ आंसू बहाये बेहटा हु ,
लिखता हु जख्मी कलम से ,पर अपनी सचाई कहता हु,
में न लेखक हु,न कवि,न तजुर्बे के बड़ा,
बस एक इंसान की हैसियत से ,
 में बस हाथ में कलम उठाये बेहटा हु.