Saturday, 2 April 2016

मोहबत्त का मौसम फिर आगया


मोहबत्त का मौसम फिर आगया 


 ज़बान पे न जाने क्यों उनका नाम आगया ,
बीतें पलों की कहानी के खुले जो पन्ने ,
तो आँखों के सामने फिर वोही एक सवाल आगया ,

क्यों आये वो फिर ज़िन्दगी में ये न पूछो, 
मेरे लिए तो जैसे ज़हेन में भूचाल आगया ,
मोहबत्त, इश्क़ जहां भूला चुके हम  ,
वही दूसरे सिरे पे उनके प्यार का पैगाम आगया,

लबो पे थे मेरे नाम हज़ार ,पर हर चहेरे में उनका चहेरा नज़र आगया ,
 कैसे भुलाऊ अब उन्हें ,
देखो मुझे नशे में कभी ,में उनके ही नाम का जाम लगा फिर आगया ,

गीले-शिकवे बहुत है मुझे उनसे ,
पर कहु क्या मेरा तो ये दिल नजाने कब और कैसे उनपे आगया ,
कोई सम्भाल सके मुझे तो सम्भालो,
देखो ये आशिक़ फिर आशिकी करने आगया ,

अब कैसे समझाये इस दिल को,
यह जैसे खुले आसमान में उड़ते ख्वाब बनाता चला गया ,
शायद अब ये फिर तैयार है ,चल मोहबत करते है ,
क्या पता शायद मौसम ऐ रूख उनका हमारी और आगया। 
  
कवि-निशित लोढ़ा