Friday, 6 May 2016

पिता की कही बातें

 पिता की कही बातें 

माँ को गले लगाते हो, कुछ पल मुझे भी याद करो ,
पापा तुम बहुत याद आते हो,कुछ ऐसी भी बात करो ,
मन में जज़्बात है मेरे ,जो कहे न पाया, तो ऐसे न बात करो,
न सोचो के दिल में प्यार नहीं, बस मिल गले ,मेरी ज़िन्दगी खुशियों से आबाद करो ,

में हर वक़्त ज़िम्मेदारी से घिरा ताकि तुम सब कभी मायूस न हो ,
मैंने ज़िंदगी की हर तकलीफ को झेला ,ताकि तुम्हे कभी महसूस न हो ,
हर ख़ुशी तुम्हे दे सकू ,इस कोशिश में लगा रहा ,
मेरे बचपन में जो कमियाँ रही उनसे तुम्हे महफूज़ रखू ,

मन में मेरे भी लाख भाव छुपे है ,आँखों से न कर बया सकू ,
इस समाज का नियम है ,पिता हु तो सदा गम्भीर रहु ,
मेरी बातें रहे रूखी -सुखी ,लगे तुम्हे जैसे हिदायत हो,
पर मेरा दिल है माँ जैसा ,किन्तु में हु तो जैसे तस्वीर हु ,

भुला नहीं हु तुम बच्चो की वो तुतलाती बोली ,
पल-पल बढ़ते हर पल में,वो यादो की भर्ती झोली ,
कंधों पे वो तुम मेरे बेहट के घूमे जो हो हर गली ,
होली और दिवाली पर तुम बच्चों की देखी खुशियों की टोली ,

याद है मुझको मेरी डाँट से ,हर बात पे तुम्हारा सहम जाना ,
आंसू की बहती वो नईया सारी, भाव नयन के थम जाना ,
जब दौड़ माँ के करीब जो उनके जा उनसे लिपट जाना ,

तुम्हारी हर ख़ुशी में,मेरा शामिल न हो पाना ,
तुम हुए जब आँखों से ओझल ,तब हाथ हवा में देर तक युही फहराना ,
दूर गए हो तुम अब मुझसे ,तो मन इन् बातों से बहलता हु ,
तारीख देखता बस युही ,बस यादों से मन भर आता हु,

दिल से कहता, अब जब तुम घर आओगे, प्यार मेरा दिखलाऊँगा,
माँ की तरह तुझे अपनत्व से गले लगाऊंगा ,
आकर तुम बस मत चले जाना वो बातें दो चार हुई ,
क्या करू बेटा पिता का पद ही है कुछ ऐसा ये बात फिर खुद को समझाऊँगा।

कवि निशित लोढ़ा