Saturday, 2 April 2016

मोहबत्त का मौसम फिर आगया


मोहबत्त का मौसम फिर आगया 


 ज़बान पे न जाने क्यों उनका नाम आगया ,
बीतें पलों की कहानी के खुले जो पन्ने ,
तो आँखों के सामने फिर वोही एक सवाल आगया ,

क्यों आये वो फिर ज़िन्दगी में ये न पूछो, 
मेरे लिए तो जैसे ज़हेन में भूचाल आगया ,
मोहबत्त, इश्क़ जहां भूला चुके हम  ,
वही दूसरे सिरे पे उनके प्यार का पैगाम आगया,

लबो पे थे मेरे नाम हज़ार ,पर हर चहेरे में उनका चहेरा नज़र आगया ,
 कैसे भुलाऊ अब उन्हें ,
देखो मुझे नशे में कभी ,में उनके ही नाम का जाम लगा फिर आगया ,

गीले-शिकवे बहुत है मुझे उनसे ,
पर कहु क्या मेरा तो ये दिल नजाने कब और कैसे उनपे आगया ,
कोई सम्भाल सके मुझे तो सम्भालो,
देखो ये आशिक़ फिर आशिकी करने आगया ,

अब कैसे समझाये इस दिल को,
यह जैसे खुले आसमान में उड़ते ख्वाब बनाता चला गया ,
शायद अब ये फिर तैयार है ,चल मोहबत करते है ,
क्या पता शायद मौसम ऐ रूख उनका हमारी और आगया। 
  
कवि-निशित लोढ़ा 

Thursday, 31 March 2016

दिल शायराना होगया

दिल शायराना होगया

मुझे मेरे सपनो में रहने दो,
मेरी हसरतो में जीने दो ,
मुझे मेरे होश में न लाना ,
चलो मुझे थोड़ा और पीने दो,

आशिक़ी का घुट लगा के बेहटा हु ,
मोहबतो का सुर बिठाए बेहटा  हु,
देखो अभी तो सिर्फ ताल जमे है,
साज़ और सरगम में आवाज़ लगाए बेहटा हु।


 निशित लोढ़ा 

ऐ साथी

ऐ साथी  

आसमान का सफर है ,
लम्बी ये डगर है,
चल कुछ कदम साथ चल लेते है कही ,

ज़िंदगी में मुश्किलें है ,
मुस्कराहट भी है हर घड़ी ,
फिर क्यों न बैठ साथ थोड़ा हस् ले कभी,

चाहत है कही, 
मोहबत भी है उनसे  ,
चल आशिक़ी कर लेते है अगर वक़्त मिले युही   ,

फिर साथ ज़िन्दगी का है ,
साँसे और धड़कन है ,
मिले खुलके तो चल जी लेते है फिर अभी .
चल जी लेते है युही।

निशित लोढ़ा 

Monday, 28 March 2016

वक़्त कम होगया

  वक़्त कम होगया 

आज कल लिखने को शब्द कम मिलते है ,
शायद दिल का दर्द मेरा कम होगया ,
मिलने को लोग कहा मिलते है ,
शायद वक़्त मिलने का कम होगया ,
अक्सर पाया मैंने खुद को वही ,
जहां लेने को साँसे और जीने को वक़्त कम होगया।

निशित लोढ़ा 

Sunday, 27 March 2016

शायरी

शायरी

मुश्किलों से अक्सर हम मिला करते है ,
कोशिश उनसे निकलने की हर वक़्त किया करते है ,
 देखा है ज़िन्दगी में ऐसा दौर भी ,
जिस मोड़ पे हम मर के जीते ,और जी के मरा करते है।

लाख कोशिश कर लो मुझे हराने की ,
में जीत के निकलुंगा मैंने ठानी है ,
कोशिश करुगा हर वक़्त में चाहे वक़्त ही न हो मेरा ,
साँसे लेता रहूगा शायद यही ज़िंदगानी है।

निशित लोढ़ा 

Saturday, 26 March 2016

जाने कैसा राज़ है

जाने कैसा राज़ है

एक बात होटों पे है जो आई नहीं ,
बस आँखों से है झाकती ,
तुमसे कभी ,मुझसे कभी ,
कुछ लफ्ज़ है वो मांगती ,
जिनको पहेन के होटों तक आजाये वो, 
आवाज़ की बाहों में बाहें दाल इठलाये वो,
लेकिन जो ये एक बात है ,
एहसास ही एहसास है ,
खुशबू सी है जैसे हवा में तैरती ,
खुशबू जो की आवाज़ है,
जिसका पता तुमको भी है,
 जिसकी खबर मुझको भी है,
दुनिया से भी छुपता नहीं ,
ये जाने कैसा राज़ है। 

जावेद अख्तर 
 

Thursday, 24 March 2016

में हु थोड़ा उनमे थोड़े मुझमें

में हु थोड़ा उनमे थोड़े मुझमें 

छूटे न छूटे ऐसा रिश्ता बन जाये उनसे ,
दुनिया छोड़ जाये पर वो न दूर जाये मुझसे ,

कहे दू उनसे वो क्या है मेरा लिए ,
या बन जाऊ अंजान हमेशा के लिए उनसे,

 संग चलू उनके हाथों में हाथ कही,
या चल दू मुसाफिर बन ,कि रहे न जाऊ खुदमे , 

लिखू कहानी बीतें पल की संग कही ,
या जी लू ज़िन्दगी थोड़ा उनमे थोड़ा मुझमे ,

कहा हु में अब समझ नहीं आता याद में उनके ,
बस लेता हु साँसे ,धड़कन में थोड़ा उनके थोड़ा मुझमे।