Friday, 13 May 2016

ढूंढता बचपन

ढूंढता बचपन

ज़िन्दगी की दौड़ में ,तजुर्बा कच्चा ही रहे गया ,
हम सिख न पाए फरेब ,और ये दिल बच्चा ही रहे गया ,

बचपन में  जहां चाहा हस्ते और रो लेते थे ,
पर अब मुस्कान को तमीज और आंसू को तन्हाई चाइये ,

हम भी मुस्कुराते थे कभी बेहपरवाह अंदाज से ,
देखा है खुद को कुछ पुरानी तस्वीरो में ,

चलो कभी मुस्कुराने की वजह ढूंढते है ,
तुम हमे ढूंढो हम तुम्हे ढूंढते है।

कवि निशित लोढ़ा